gram sabha
#जोहार #आदिवासी_परिवार
"ग्राम-सभा"
पढ़े-लिखे आदिवासी केंद्र सरकार के लिए काम करते हैं...या भारत सरकार/आदिवासी राज के लिए काम करते हैं??!
पढ़े-लिखे आदिवासी पार्टीवाद/संगठनवाद के लिए काम करते हैं...या राजी पड़हा/मांझी परगना/मुंडा मनकी/पटेल,गमेती,तड़वी अन्य पुरखौती व्यवस्था के लिए काम करते हैं...!!!??!
पढ़े-लिखे आदिवासी केंद्र सरकार के अधिनियमों के तहत खुद को संचालित करना चाहते हैं...या आदिवासी पुरखौती रूढ़ि-प्रथा के तहत खुद को संचालित करना चाहते हैं...!!!???
सभी को पता है कि एक "म्यान" में दो तलवारें नहीं समां सकती है... आदिवासी समुदाय को ही तय करना पड़ेगा कि केंद्र सरकार के अधिनियमों या पुरखौती रूढ़ि-प्रथा से हम आदिवासियों के सिस्टम और व्यवस्था को चलाना है...
जो संविधान पढ़ते हैं उन्हें ही समझ आयेगा...तो फिर भारतीय संविधान पढ़ना शुरू करो...
कुछ अक्ल के दुश्मन ये कहते हैं कि जब रूढ़ि और प्रथा से आदिवासी समुदाय चलता है तो फिर सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट को क्यों मानते हैं... अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम 1989 को क्यों मानते हैं...
से पढ़े लिखे आदिवासी संविधान और कानून भी पढ़ रहे हैं... लेकिन इसकी गहराई और आदिवासी समुदाय के पुरखौती सिस्टम और व्यवस्था को नहीं जानते हैं और ना ही समझते हैं...
तो फिर कैसे समझ आयेगा
नुसूचित जाति और अनुसूचित जाति अधिनियम 1989 से एससी और एसटी के शोषण और अत्याचार का निवारण वा रोक वा संरक्षण करता है...
आदिवासी समुदाय के सिस्टम और व्यवस्था के लिए अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम 1989 नहीं बनाया गया है..
इसलिए हम आदिवासी अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम 1989 को सहमति वा स्वागत करते हैं...
लेकिन
जैसे वन अधिकार अधिनियम
वन विभाग पट्टा अधिनियम
पेसा कानून 1996
लेग्स लुसाई
इत्यादि का विरोध करते हैं चूंकि ये आदिवासी समुदाय के सिस्टम और व्यवस्था के लिए बनाया गया है...जो अवैध और असंवैधानिक है...
केंद्र सरकार और राज्य सरकार आदिवासी समुदाय के सिस्टम और व्यवस्था को चलाने के लिए कानून नहीं बना सकती है...इसकी इजाजत भारतीय संविधान भी नहीं देती है...
लेकिन इसके लीडर्स और अन्य पढ़े लिखे आदिवासी मिलकर आदिवासी समुदाय को केंद्र सरकार से बेच दे रहे हैं...
आदिवासी समुदाय के विश्वास और भरोसा को 5 सालों बाद "नीलामी" करवाते हैं...
दूसरी Converted आदिवासी धीरे धीरे आदिवासी समुदाय को निगल जा रही है...
सबका ईलाज या बंदोबस्त आदिवासी समुदाय के पुरखौती सिस्टम और व्यवस्था में ही निहित है...
आदिवासी लड़के और लड़कियों "अंतिम लड़ाई" भविष्य में लड़ना हमारा ही बाकी है...
तो फिर संविधान और ग्राम सभा के विचारधारा का कांसेप्ट को अपना औजार बना लो...
पुरखौती राज बनाना तय है
जय पुरखा
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